From Gaurav Sharma
सजीव कोशिकाओं में भोजन के आक्सीकरण के फलस्वरूप ऊर्जा उत्पन्न होने की क्रिया को कोशिकीय श्वसन कहते हैं।यह एक केटाबोलिक क्रिया है जो आक्सीजन की उपस्थिति या अनुपस्थिति दोनों ही अवस्थाओं में सम्पन्न हो सकती है। इस क्रिया के दौरान मुक्त होने वाली ऊर्जा को एटीपीनामक जैव अणु में संग्रहित करके रख लिया जाता है जिसका उपयोग सजीव अपनी विभिन्न जैविक क्रियाओं में करते हैं। यह जैव-रासायनिक क्रियापौधों एवं जन्तुओं दोनों की ही कोशिकाओं में दिन-रात हर समय होती रहती है। कोशिकाएँ भोज्य पदार्थ के रूप में ग्लूकोज, अमीनो अम्ल तथा वसीय अम्ल का प्रयोग करती हैं जिनको आक्सीकृत करने के लिए आक्सीजन का परमाणु इलेक्ट्रान ग्रहण करने का कार्य करता है।
सरल समीकरण C6H12O6 + 6O2 → 6CO2 + 6H2O
ΔG = -2880 किलो जूल (प्रति ग्लूकोज का अणु)
कोशिकीय श्वसन एवं श्वास क्रिया में अभिन्न सम्बंध है एवं ये दोनों क्रियाएँ एक-दूसरे की पूरक हैं। श्वांस क्रिया सजीव के श्वसन अंगों एवं उनके वातावरण के बीच होती है। इसके दौरान सजीव एवं उनके वातावरण के बीच आक्सीजन एवं कार्बन डाईऑक्साइड गैस का आदान-प्रदान होता है तथा इस क्रिया द्वारा आक्सीजन गैस वातावरण से सजीवों के श्वसन अंगों में पहुँचती है। आक्सीजन गैस श्वसन अंगों से विसरण द्वारा रक्त में प्रवेश कर जाती है। रक्त परिवहन का माध्यम है जो इस आक्सीजन को शरीर के विभिन्न भागों की कोशिकाओं मे पहुँचा देता है। वहाँ इसका उपयोग कोशिकाएँ अपने कोशिकीय श्वसन में करती हैं।
श्वसन की क्रिया प्रत्येक जीवित कोशिका के कोशिका द्रव्य (साइटोप्लाज्म) एवं माइटोकाण्ड्रिया में सम्पन्न होती है। श्वसन सम्बन्धित प्रारम्भिक क्रियाएँ साइटोप्लाज्म में होती है तथा शेष क्रियाएँ माइटोकाण्ड्रियाओं में होती हैं। चूँकि क्रिया के अंतिम चरण में ही अधिकांश ऊर्जा उत्पन्न होती हैं। इसलिए माइटोकाण्ड्रिया को कोशिका का श्वसनांग या शक्ति-गृह (पावर हाउस) कहा जाता है।
श्वसन की क्रिया के प्रथम चरण में श्वसन-द्रव्यों (ग्लूकोज, ग्लाइकोजेन, स्टार्च आदि कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, पेप्टाइड या अमीनो अम्ल तथा वसा या वसीय अम्ल के विघटन से पाइरूविक अम्ल का निर्माण होता है तथा द्वितीय चरण में पाइरूविक अम्ल के पूर्ण आक्सीकरण से जल एवं कार्बन डाईऑक्साइड बनते हैं। क्रियाविधि का प्रथम चरण कोशिका के कोशिका द्रव्य में होता है, इसमें कोई भी कोशिकांग सीधे तौर पर संलग्न नहीं होते हैं। द्वितीय चरण कोशिका द्रव्य में उपस्थित माइटोकाँन्ड्रिया के मैट्रिक्स में सम्पन्न होता है। अनॉक्सीय श्वसन की क्रिया जिसमें श्वसन-द्रव्यों के विघटन से लैक्टिक अम्ल या इथाइल अल्कोहल बनता है, कोशिका द्रव्य में तथा ऑक्सीय श्वसन की क्रिया माइटोकाँन्ड्रिया में होती है। प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं माइटोकाँण्ड्रियाँ नहीं पाई जाती है इसलिए इनमें क्रेब्स चक्र की क्रिया कोशिका द्रव में ही होती है। ग्लाइकोलिसिस ऑक्सीय श्वसन की प्रथम अवस्था है जो कोशिका द्रव में होती है। इस क्रिया में ग्लूकोज का आंशिक आक्सीकरण होता है, फलस्वरूप १ अणु ग्लूकोज से पाइरूविक अम्ल के २ अणु बनते हैं तथा कुछ ऊर्जा मुक्त होती है। यह क्रिया कई चरणों में होती है एवं प्रत्येक चरण में एक विशिष्ठ इन्जाइम उत्प्रेरक का कार्य करता है। ग्लाइकोसिस के विभिन्न चरणों का पता एम्बडेन, मेयरहॉफ एवं पर्नास नामक तीन वैज्ञानिकों ने लगाया। इसलिए श्वसन की इस अवस्था को इन तीनों वैज्ञानिकों के नाम के आधार पर इएमपी पाथवे भी कहते हैं। इसमें ग्लूकोज में संचित ऊर्जा का ४ प्रतिशत भाग मुक्त होकर एनएडीएच (NADH2) में चली जाती है तथा शेष ९६ प्रतिशत ऊर्जा पाइरूविक अम्ल में संचित हो जाती है।
ग्लूकोज + 2 NAD+ + 2 Pi + 2 ADP → 2 पाइरूवेट + 2 NADH + 2 ATP +2H+ + 2 H2O
ग्लाइकोलिसिस के पहले पाँच चरण में ६ कार्बन विशिष्ट ग्लूकोज का अणु ऊर्जा के प्रयोग से तीन कार्बन वाले अणु में विघटित होता है। क्रेब्स चक्र ऑक्सीय श्वसन की दूसरी अवस्था है। यह यूकैरियोटिक कोशिका के माइटोकाँन्ड्रिया तथा प्रोकैरियोट्स के कोशिका द्रव में होती है। इस क्रिया में ग्लाइकोलिसिस का अंत पदार्थ पाइरूविक अम्ल पूर्ण रूप से आक्सीकृत होकर कार्बन डाईआक्साइड और जल में बदल जाता है तथा ऐसे अनेक पदार्थों का निर्माण होता है जिनका उपयोग अन्य जैव-रासायनिक परिपथों में अमीनो अम्ल, प्यूरिन, पिरिमिडिन, फैटी अम्ल एवं ग्लूकोज आदि के निर्माण में होता है तथा अधिक मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है। यह क्रिया कई चरणों में होती है तथा एक चक्र के रूप में कार्य करती है। इस चक्र का अध्ययन सर्वप्रथम हैन्स एडोल्फ क्रेब ने किया था, उन्हीं के नाम पर इस क्रिया को क्रेब्स चक्र कहते हैं। इस क्रिया का प्रथम क्रियाफल साइट्रिक अम्ल है अतः इस क्रिया को साइट्रिक अम्ल चक्र (साइट्रिक एसिड साइकिल) भी कहते हैं। साइट्रिक अम्ल में ३ कार्बोक्सिलिक मूलक (-COOH) उपस्थित रहता है अतः इसे ट्राइ कार्बोक्सिलिक साइकिल या टीसीए चक्र भी कहते हैं। क्रेब्स चक्र की चक्रीय प्रतिक्रियाओं में पाइरूविक अम्ल के पूर्ण उपचन से पूरे चक्र में तीन स्थानों पर कार्बन डाइऑक्साइड (CO2 ) का एक एक अणु बाहर निकलता है, अर्थात् पाइरूविक अम्ल के तीनों कार्बन परमाणु तीन अणु कार्बन डाइऑक्साइड के रूप मं बाहर निकलते हैं। श्वसन क्रिया के क्रेब चक्र के दौरान पायरूविक अम्ल ऑक्सेलोएसिटिक अम्ल से क्रिया करता है। इसमें तीन सह-एन्जाइम (विटामिन) काम आते हैं। सर्वप्रथम पाइरूविक अम्ल इन्जाइम की उपस्थिति में आक्सीकृत होकर कार्बन डाईआक्साइड तथा हाइड्रोजन में बदल जाता है। हाइड्रोजन डाइड्रोजन ग्राही एनएडी (NAD) के साथ संयुक्त होकर एनएडीएच टू (NADH2) बनाता है तथा कार्बन डाईआक्साइड गैस वायुमंडल में मुक्त हो जाती है। एनएडीएच टू (NADH2) में उपस्थित हाइड्रोजन कई श्वसन इन्जाइमों (फ्लेवोप्रोटीन, साइटोक्रोम) की उस्थिति में आक्सीजन से मिलकर जल में बदल जाता है तथा ऊर्जा मुक्त होती है। यह ऊर्जा एडीपी से मिलकर एटीपी के रूप में संचित हो जाती है। एक अणु ग्लूकोज के पूर्ण रूप से आक्सीकरण के फलस्वरूप ३८ अणु एटीपी का निर्माण होता है। एटीपी ऊर्जा का भंडार है जिसे ऊर्जा की मुद्रा भी कहते हैं। एटीपी में संचित ऊर्जा जीवों के आवश्यकतानुसार विघटित होकर ऊर्जा मुक्त होती है जिसमें जीवों की विभिन्न जैविक क्रियाएँ संचालित होती है। अनाक्सीय श्वसन में आक्सीजन की आवश्यकता नहीं पड़ती है तथा यह आक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है। इस क्रिया में भोजन का अपूर्ण आक्सीकरण होता है। जन्तुओं में इस क्रिया के फलस्वरूप कार्बन डाई-आक्साइड तथा लैक्टिक अम्ल का निर्माण होता है तथा पौधों में कार्बन डाई-आक्साइड तथा इथाइल अल्कोहल बनता है एवं बहुत कम मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है। इस प्रकार का श्वसन कुछ निम्न श्रेणी के पौधों, यीस्ट, जीवाणु, एवं अन्तः परजीवी जन्तुओं जैसे गोलकृमि, फीताकृमि, मोनोसिस्टिस इत्यादि में होता है। कुछ विशेष परिस्थितियों में उच्च श्रेणी के जन्तुओं, पौधों के ऊतकों, बीजों, रसदार फलों आदि में भी आक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है। मनुष्यों या उच्च श्रेणी के जीवों की माँसपेशियों के थकने की अवस्था में यह श्वसन होता है। जिन जीवधारियों में यह श्वसन होता है उसे एनएरोब्स कहते हैं।
ऑक्सीय श्वसन के समान ही अनाक्सी श्वसन के प्रारम्भ में ग्लाइकोलिसिस की क्रिया होती है जिसके अंत में पाइरूविक अम्ल बनता है। आगे की प्रक्रिया में आक्सीजन के अभाव में पाइरूविक अम्ल का पूर्ण आक्सीकरण नहीं हो पाता है अतः इस श्वसन में आक्सीय श्वसन की तुलना में बहुत कम ऊर्जा उत्पन्न होती है। पौधों में यह पाइरूविक अम्ल कार्बोक्सीलेज इन्जाइम की उपस्थिति में एसिटल्डिहाइडऔर कार्बन डाइ आक्साइड में बदल जाती है। इसके बाद एसिटल्डिहाइड डिहाइड्रोजिनेज इन्जाइम की उपस्थिति में NADH2 द्वारा अवकृत होकर NAD तथा इथाइल अल्कोहल में परिणत हो जाता है।प्राणियों की पेशियों तथा कुछ जीवाणुओं में आक्सीजन की अनुपस्थिति में ग्लाइकोलिसि के अंत में निर्मित पाइरूविक अम्ल NADH2 की सहायता से लैक्टिक अम्ल में बदल जाता है।
C6H12O6→ 2CH3CH2OH + 2CO2 + 118 किलो जूल ऊर्जा
iibm

monster






ADVERTISEMENTS

copyrightimage