From Gaurav Sharma
वैदिक सभ्यता के प्रर्वतक को ‘आर्यजन’ का नाम दिया गया है। आर्यजन भारत के ही मूल निवासी थे। वैदिक काल को ऋग्वैदिक काल (1500-1000 ई.पू.) तथा उत्तर वैदिक काल (1000-600 ई.पू.) में विभक्त किया गया है।
ऋग्वैदिक काल:
ऋग्वैदिक काल में आर्यजन सात नदियों वाले सप्त सिंधु क्षेत्रा में रहते थे। यह वर्तमान में पंजाब व हरियाणा के कुछ क्षेत्रों में स्थित हैं। कुरूक्षेत्रा के आस-पास के क्षत्रों को उन्होंने ब्रह्मवर्त का नाम दिया। इसके बाद गंगा-यमुना के मैदानी प्रदेश तक बढ़ आये और इस क्षेत्रा को ‘ब्रहर्षि देश’ कहा। इसके उपरान्त वे हिमालय के दक्षिण एवं नर्मदा नदी के उत्तर (विन्ध्याचल के उत्तर) के मध्य के कुछ प्रदेशों तक बढ़ आये और उस प्रदेश को ‘मध्य प्रदेश’ का नाम दिया। जब उन्होंने वर्तमान के बिहार, बंगाल के आस-पास तक पहुंच गये तब समस्त उत्तरी भारत के क्षेत्रा को ‘आर्यावर्त’ अर्थात् आर्यो के रहने का स्थान कहकर संबोधित किया। उनके भौगोलिक क्षेत्रा के अंतर्गत गोमती का मैदान, द. जम्मू-कश्मीर, दक्षिणी अफगानिस्तान भी आते हैं। ‘भौगोलिक ज्ञान’ ऋग्वेद काल में आर्यो का निवास स्थान मुख्य रूप से पंजाब तथा सरस्वती से लगा अम्बाला तथा आस-पास का क्षेत्रा था। ऋग्वेद में 40 नदियों का उल्लेख है। सबसे महत्त्वपूर्ण एवं सर्वाधिक उल्लेखित नदी सरस्वती है। दूसरी महत्त्वपूर्ण नदी सिन्धु है। सरस्वती नदी का नदीतमा (नदियों में अग्रवर्ती) तथा सरयु का उल्लेख तीन बार तथा गंगा का उल्लेख एक बार हुआ है। नदी स्तुति में अंतिम नदी गोमती (गोमल) है। ऋग्वेद में चार समुद्रों का उल्लेख है। ‘पर्वत’ तीन पर्वतों का उल्लेख मिलता है- हिमवन्त (हिमालय), मंूजवंत पर्वत (हिन्दूकुश पर्वत), त्रिकोटा पर्वत। आर्यों का मादक पेय ‘सोम’ मूजवंत पर्वत से आता था। रावी नदी के तट पर प्रसिद्ध वैदिक दाशराज्ञ युद्ध (सुदास एवं दिवोदास के बीच) हुआ था। आर्यों को धन्व (मरुस्थलो) का भी ज्ञान था।
आर्थिक व्यवस्था
प्रारंभिक वैदिक समाज की अर्थव्यवस्था का आधार पशुपालन था। गाय ही आर्यो के विनिमय का प्रमुख साधन था। ज्यादा पशु रखने वाले को ‘गोमत’ कहा जाता था। राजा को नियमित कर देने या भू-राजस्व देने की पद्धति विकसित नहीं हुई थी। दूरी को गवयुती और समय को मापने के लिए गोधुली शब्द का, पुत्री के लिए दुहिता, युद्धों के लिए गविष्ट जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। लोग सोना व चांदी से परिचित थे। अग्नि को पथ निर्माता (पथिकृत) कहा गया है। उस काल में कृत्रिम सिंचाई की व्यवस्था भी थी। काठक संहिता में 24 बैलों द्वारा हल खीचें जाने का उल्लेख है। सर्वप्रथम शतपथ ब्राह्मण में कृषि की समस्त प्रक्रियाओं का उल्लेख मिलता है। ‘उद्योग’ वस्त्रा-निर्माण, बर्तन निर्माण, चर्म-कार्य तथा लकड़ी व धातु उद्योग थे। बढ़ई और धातुकार का कार्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। उद्योग-धंधे व्यक्तिगत स्तर पर किये जाते थे। व्यापार हेतु सुदूरवर्ती क्षेत्रों में भ्रमण करने वाले व्यक्ति को ‘पणि’ कहा जाता था।
राजतंत्रा
आरंभिक वैदिक समाज में राजा का निर्वाचन युद्ध में नेतृत्व करने के लिए किया जाता था। वह किसी क्षेत्रा विशेष का प्रधान नहीं बल्कि वह किसी जन-विशेष का प्रधान होता था। वंशानुगत राज की अवधारणा नहीं थी। राजा को गोमत कहा जाता था। पुरोहित राजा की सहायता करता था। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार अभिषेक होने पर राजा महान बन जाता था। राजसूय यज्ञ करने वालों की उपाधि राजा थी तथा वाजपेय यज्ञ करने वाले की सम्राट। राजा की सहायता हेतु सेनानी, ग्रामाीण तथा पुरोहित आदि 12 रत्निनों के घर जाता था। राजा की सेना में व्रात, गण, ग्राम एवं शर्ध नामक कबीलाई सैनिक होते थे।
वैदिक देवतागण
देवताओं में इन्द्र, अग्नि और वरुण को सबसे अधिक महत्व प्राप्त है। इन्द्र वीरता तथा शक्ति, बादल तथा तड़ित का देवता था। उसे बज्रबाहू भी कहा जाता था। अग्नि की उपाधि धूमकेतु थी। उसे देवताओं का मुख, धौस, दुर्ग का भेदक, अतिथि तथ दुर्गों का भेदक बताया गया है। वरूण का संबंध वायु जल से था। वह ऋतुओं का नियामक एवं नैतिक व्यवस्था बनाए रखने वाला देवता था। सोम देवता का उल्लेख ऋग्वेद के नवें मंडल में 114 सूक्तों में किया गया है। सोम का संबंध चन्द्रमा एवं वनस्पति देवता से था। इड़ा (दुर्गा) देवी अन्नपूर्णा और समृद्धि की देवी थीं। रूद्र देवता नैतिकता की रक्षा करने वाला तथा महामारी का प्रकोप से बचाने वाला अति क्रोधी देवता था। अर्धदेव के अन्तर्गत मनु, ऋभु, गंधर्व तथा अप्सरा आदि आते थे। मूर्तिपूजा और मंदिर पूजा का प्रचलन नहीं था। ‘यज्ञ’ श्रोत यज्ञों का संबंध सोम पूजा से था। सोम यज्ञों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण अश्वमेघ तथा राजसूय यज्ञ थे। ऋग्वेद में ‘ब्रह्मा’ का अर्थ यज्ञ से है। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में निर्गुण ब्रह्मा का उल्लेख है। यजुर्वेद एवं ऐतरेय में रूद्र को जनसाधारण का देवता बताया गया है। ‘दसराज्ञ युद्ध’ रावी के तट पर भरतवंश के राजा सुदास एवं अन्य दसजनों के बीच यह युद्ध हुआ था। इसमें पुरोहित विशिष्ट के यजमान राजा सुदास की विजय हुई थी। राजसूय यज्ञ से राजा को दिव्यशक्ति मिल जाती थी। वाजपेय यज्ञ में रथदौड़ आयोजित होता था।
यजुर्वेद
इसमें यज्ञों को संपन्न कराने वाले सहायक मंत्रों का संग्रह है। इसके दो भाग हैं- कृष्ण यजुर्वेद तथा शुक्ल यजुर्वेद। कृष्ण यजुर्वेद में छन्दोबद्ध मंत्रा तथा गद्यात्मक वाक्य हैं। शुक्ल यजुर्वेद में केवल मंत्रा हैं। इसकी संहिताओं को वाजसनेय भी कहा जाता है।
अथर्ववेद
इसे ‘अथर्वांगिरस वेद’ भी कहा जाता है, इसमें उस समय के समाज का चित्रा मिलता है, जब आर्यों ने अनार्यों के अनेक धार्मिक विश्वासों को अपना लिया था। इसमें कुल 20 कांड, 731 सूक्त तथा 5987 मंत्रों का संग्रह है। अथर्ववेद में रोग निवारण, तंत्रा-मंत्रा, विवाह, राजकर्म, औषधि आदि लौकिक विषयों से संबंधित मंत्रा हैं। अथर्ववेद को ब्रह्मवेद भी कहा जाता है।
वेदांग
वेदों के अर्थ का समझने में सहायता हेतु छः वेदांग रचे गये- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरूक्त, छंद एवं ज्योतिष। शिक्षा- इसका संबंध वैदिक मंत्रों के शुद्ध उच्चारण से है। कल्पसूत्रा- वैदिक विधि-विधानों का छोटे-छोटे वाक्यों में सूत्रा बनाकर प्रस्तुत किया गया है। व्याकरण- इसका संबंध भाषा संबंधी नियमों से है। व्याकरण की प्रमुख रचना पाणिनीकृत ‘अष्टाध्यायी’ (5वीं सदी ई.पू.) है। निरूक्त- यह भाषा शास्त्रा का ग्रंथ है। इसमे क्लिष्ट वैदिक शब्दों की व्याख्या है। प्रसिद्ध ग्रंथ यास्क रचित ‘निरूक्त’ है। छन्द- वैदिक मंत्रा प्रायः छंद बद्ध हैं। ज्योतिष- शुभ मुहूर्त में यज्ञिक अनुष्ठान करने के लिए ग्रहों तथा नक्षत्रों का अध्ययन करके सही समय ज्ञात करने की विधि से इसकी उत्पत्ति हुई।
उपनिषद
उपनिषदों को ‘वेदांत’ भी कहा जाता है। ये कुल 108 हैं। उपनिषदों का अर्थ है- रहस्यज्ञान हेतु गुरू के समीप निष्ठापूर्वक बैठना। ये मुख्यतः ज्ञानमार्गी हैं तथा इनका मुख्य विषय ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन है। मुक्तिकोपनिषद में 108 उपनिषदों का उल्लेख है। सर्वाधिक प्राचीन और प्रमाणिक 12 उपनिषद माने जाते हैं। भारत का राष्ट्रीय वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ -मुण्डकोपनिषद से उदघृत है।
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